अमेरिकी इतिहास में पहली बार राष्ट्रीय कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर (करीब 3800 लाख करोड़ रुपये) के आंकड़े को पार कर गया है। बढ़ता बजट घाटा, अंधाधुंध सरकारी खर्च और कर्ज पर चुकाया जाने वाला भारी-भरकम ब्याज अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट बन चुका है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या ईरान के साथ मौजूदा टकराव ने अमेरिका को आर्थिक तबाही के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है?

अमेरिका के बढ़ते कर्ज के मुख्य कारण
अमेरिका दशकों से अपनी आय से ज्यादा खर्च कर रहा है। सरकार इस बजट घाटे को बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज़ जारी करके पूरा करती है, जो अब रिकॉर्ड स्तर पर है।
- कर्ज और जीडीपी का खतरनाक अनुपात: अमेरिका की कुल जीडीपी लगभग 32 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर हो गया है। इसका मतलब है कि सरकारी कर्ज जीडीपी के 125% तक पहुंच चुका है।
- ब्याज का भारी बोझ: अमेरिका के लिए असली खतरा सिर्फ कर्ज का मूलधन नहीं, बल्कि उस पर लगने वाला ब्याज है। सरकार का सालाना ब्याज भुगतान अब 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है।
- आर्थिक नीतियां: कोविड-19 के दौरान किया गया बेतहाशा खर्च, बड़े कारोबारियों को दी गई टैक्स में छूट और लगातार बढ़ता रक्षा बजट इस विशाल कर्ज की बड़ी वजह हैं।
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ईरान युद्ध ने कैसे बढ़ाई अमेरिका की मुश्किलें?
यह सच है कि अमेरिका का कर्ज ईरान युद्ध से पहले ही 30 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका था, लेकिन इस मौजूदा टकराव ने ‘आग में घी’ का काम किया है:
- सैन्य खर्च में भारी उछाल: खाड़ी देशों में सैन्य तैनाती, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और ईरान द्वारा तबाह किए गए सैन्य ठिकानों को दोबारा बनाने का खर्च सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
- कच्चे तेल और महंगाई का संकट: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव के कारण कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और महंगाई का खतरा बढ़ गया है।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त चेतावनी: आईएमएफ ने आगाह किया है कि मध्य पूर्व का यह तनाव और बढ़ता रक्षा खर्च अमेरिका के सरकारी खजाने पर गंभीर दबाव डाल रहा है, जिससे ब्याज दरों में कटौती मुश्किल हो जाएगी।
निष्कर्ष: क्या सच में दिवालिया हो जाएगा सुपरपावर?
फिलहाल अमेरिका के तुरंत दिवालिया होने की संभावना नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वैश्विक व्यापार अब भी अमेरिकी डॉलर में होता है और निवेशकों का भरोसा डॉलर पर कायम है। हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर घाटा और कर्ज इसी रफ्तार से बढ़ते रहे, तो खर्च के मुकाबले कमाई न होने पर अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश भी गंभीर आर्थिक पतन का शिकार हो सकता है।
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