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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ‘तीन भाषा नीति’ (Three Language Policy) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने बोर्ड को इस नीति पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है, जिससे विशेष रूप से कक्षा 6 के छात्रों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी शिक्षा प्रणाली में भाषा के ढांचे और स्कूलों के सामने आ रही व्यावहारिक चुनौतियों के संदर्भ में काफी अहम मानी जा रही है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अंग्रेजी को गैर-मूल या ‘नॉन-नेटिव’ (Non-Native) भाषा की श्रेणी में रखने पर गंभीर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में अंग्रेजी के ऐतिहासिक विकास और भारतीय समाज में इसकी गहरी जड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि नीति बनाना सरकार और बोर्ड का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक नजरिए से यह तय करना जरूरी है कि अंग्रेजी को ‘देशज’ माना जाए या ‘गैर-देशज’। इस स्पष्टता से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की कई खामियां दूर की जा सकती हैं।
कक्षा 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य करने के नियम पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। संसद की एक समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट (2026-27 के अनुमान) में कई व्यावहारिक समस्याओं को उजागर किया है:
हालाँकि, शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर कई सकारात्मक बदलाव भी किए हैं:
संसदीय समिति की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि कक्षा 6 से तीसरी भाषा लागू करने से पहले जमीनी स्तर पर पर्याप्त तैयारियां नहीं की गई थीं। अब सभी की निगाहें CBSE और केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि क्या थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी में कोई बड़ा बदलाव होगा, या फिर छात्रों को कोई नई राहत दी जाएगी।
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