अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित टैरिफ के बाद भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों पर चर्चा गर्म है। हैरानी की बात यह है कि ट्रंप की घोषणा से ठीक पहले, दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की पहली बैठक में 2030 तक व्यापार को 190 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा था। यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप ने भारत को “बेहद मुश्किल साझेदार” बताते हुए ऑटो सेक्टर पर 25% और अन्य उत्पादों पर 26% टैरिफ लगा दिया। पर सवाल यह है कि क्या यह कदम भारत के लिए नुकसानदेह होगा या फिर भारत इसे एक अवसर में बदल पाएगा?
भारत–अमेरिका रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में लगातार मजबूत हुए हैं। बिल क्लिंटन के समय से शुरू हुई यह यात्रा जॉर्ज बुश, बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रंप और अब जो बाइडन तक बिना रुके आगे बढ़ी है। चाहे व्यापार हो या रक्षा सहयोग, दोनों देशों के बीच गहरा विश्वास दिखाई देता है। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को “महान मित्र” कहा, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा, “आप हमारे साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे।” यह टिप्पणी भले ही तल्ख लगे, पर दोनों देशों के बीच व्यापारिक सौदेबाजी की जटिलताओं को दर्शाती है।
चीन vs भारत: टैरिफ युद्ध का गणित
ट्रंप ने भारत पर 26% टैरिफ लगाया, जबकि चीन को 34% की मार झेलनी पड़ी। इसके जवाब में चीन ने अमेरिकी उत्पादों पर 34% टैरिफ लगा दिया। इस टकराव का सीधा असर चीन में स्थित अमेरिकी कंपनियों पर पड़ रहा है। ऐसे में, भारत इन कंपनियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ युद्ध के बीच टेस्ला और Apple जैसी कंपनियों का भारत की ओर रुख करना तार्किक कदम होगा।
BTA बैठक: भारत के लिए राहत की उम्मीद
टैरिफ की घोषणा से पहले हुई BTA बैठक में अमेरिका ने भारत से ऑटोमोबाइल, शराब, पेट्रोकेमिकल्स और कृषि उत्पादों पर शुल्क रियायतों की मांग की। हालाँकि, भारत के डेयरी उत्पादों को इस टैरिफ से छूट मिली, जिसे एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। आगामी बैठकों में दोनों देश इस मुद्दे पर और समझौते कर सकते हैं।
चीन से भारत: कंपनियों का पलायन?
चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र है, लेकिन अमेरिका के साथ टैरिफ युद्ध ने इसे महंगा बना दिया है। टेस्ला पहले से ही भारत में अपनी इलेक्ट्रिक कारों को लॉन्च करने की तैयारी में है, और Apple ने यहाँ iPhone के उत्पादन को बढ़ाकर वैश्विक उत्पादन का 25% हिस्सा भारत में करने का लक्ष्य रखा है। यह बदलाव न केवल ट्रंप के टैरिफ, बल्कि भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति और सस्ते श्रम की वजह से भी संभव हो रहा है।
निष्कर्ष: चुनौती या अवसर?
ट्रंप के टैरिफ से भारत को होने वाला नुकसान सीमित हो सकता है, क्योंकि अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक सुरक्षित और लाभदायक बाजार बन रहा है। यदि भारत नीतिगत सुधारों और बुनियादी ढाँचे को मजबूत करे, तो वह चीन की जगह लेने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकता है। फिलहाल, Apple और Tesla जैसे ब्रांड्स का भारत आना इस बात का संकेत है कि वैश्विक व्यापार की हवाएँ अब भारत के पक्ष में बहने लगी हैं।




